गाँव में आज भी ज़्यादातर लोग इसे “मनरेगा” ही कहते हैं और रोज़गार सेवक भी कई बार यही नाम बोल देते हैं। इसमें कोई दिक़्क़त नहीं। पर काग़ज़ पर 1 जुलाई 2026 से मनरेगा की जगह नया क़ानून चल रहा है, जिसका छोटा नाम VB-G RAM G है। पूरा नाम और क़ानून की बारीक बातें हमने इस पेज पर अलग से लिखी हैं। यहाँ सिर्फ़ वो बातें हैं जो एक मज़दूर परिवार के काम की हैं।
सबसे बड़ा बदलाव: 100 की जगह 125 दिन
पहले एक परिवार को साल में 100 दिन काम की गारंटी थी। अब यह 125 दिन है। मतलब अगर घर के लोग काम माँगते रहें तो साल में 25 दिन ज़्यादा मज़दूरी का हक़ बनता है।
एक बात ध्यान रखें – खेती के सबसे व्यस्त मौसम में राज्य सरकार 60 दिन तक यह काम रोक सकती है, ताकि खेतों में मज़दूरों की कमी न हो। कौन-से 60 दिन, यह हर राज्य अपने हिसाब से बताता है। इसलिए बुवाई या कटाई के समय पंचायत “अभी काम बंद है” कहे, तो हो सकता है यही वजह हो।
मज़दूरी ₹300 से कम नहीं
अब किसी भी राज्य में अकुशल काम की रोज़ की मज़दूरी ₹300 से कम नहीं है। कई राज्यों में इससे ज़्यादा है – जैसे हरियाणा में ₹409 और केरल में ₹401। अपने राज्य की दर मज़दूरी दर वाले पेज पर देख लें, वहाँ कैलकुलेटर भी है।
पुराना जॉब कार्ड फेंकिए मत
सबसे ज़्यादा यही सवाल आता है। जिनका जॉब कार्ड पहले से बना और चालू है, वो नए क़ानून में भी चलता है। नया कार्ड बनवाने के लिए किसी को पैसे देने की ज़रूरत नहीं है। अगर कोई “नया कार्ड बनेगा, फ़ीस लगेगी” कहे, तो सीधे ग्राम पंचायत या ब्लॉक में पूछें।
काम माँगने के 15 दिन के अंदर काम
यह नियम पहले भी था और अब भी है। आपने लिखकर काम माँगा, तो 15 दिन के भीतर काम मिलना चाहिए। न मिले तो बेरोज़गारी भत्ते का हक़ बनता है। इसलिए काम हमेशा लिखकर माँगें और रसीद ज़रूर लें – काम की माँग का फ़ॉर्म यहाँ से प्रिंट कर सकते हैं।
वेबसाइट बदल गई है
जॉब कार्ड लिस्ट, हाज़िरी और भुगतान की जानकारी अब नए पोर्टल vbgramg.dord.gov.in पर है। पुरानी nrega.nic.in वाली आदत के चक्कर में कई लोग ग़लत जगह ढूँढते रहते हैं। लिस्ट में नाम देखने का पूरा तरीक़ा यहाँ है।
पैसा कौन देता है, और इससे आपको क्या फ़र्क़ पड़ता है
अब ख़र्च केंद्र और राज्य मिलकर 60:40 में उठाते हैं (पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों में 90:10)। आम मज़दूर के लिए इसका मतलब बस इतना है कि भुगतान में देर हो तो शिकायत राज्य और ब्लॉक, दोनों स्तर पर बनती है। हर छह महीने में सोशल ऑडिट भी होना है – ग्राम सभा में जाएँ, वहाँ अपने काम और पैसे का हिसाब पूछना आपका हक़ है।
जो नहीं बदला
जॉब कार्ड ग्राम पंचायत से ही बनता है, मुफ़्त में। हाज़िरी मस्टर रोल में लगती है, पैसा सीधे बैंक या डाकघर खाते में आता है। यानी रोज़ के काम का तरीक़ा लगभग वैसा ही है – बदला है नाम, दिन और मज़दूरी।
कोई बात साफ़ न हो तो नीचे दिए पेज देख लें, या अपनी ग्राम पंचायत में रोज़गार सेवक से पूछें।
